#‎दीपिकापादुकोण‬ द्वारा अपनी आवाज देते हुए नारी स्वातंत्र्य को प्रेरित करने हेतु बनाये गए वीडियो को कई बार देखने और सुनने के बाद अभिव्यक्ति की व्यग्रता ने बिना कुछ कहे आगे बढ़ने नहीं दिया, अतः आप सब से एक प्रश्न करने का मन कर रहा है की क्या ‪#‎mybody‬‪#‎mymind‬ , ‪#‎mychoice‬ का नारा सामाजिक जीवन में औचित्यपूर्ण है ? जहाँ हम सब सहअस्तित्व से निर्मित सामाजिक ताने बाने में जीवनरत हैं ।मैं यह मानता हूँ की दीर्घकालिक विसंगतियों और इड़ा प्रधान पुरुषवादी सोच ने लैंगिक अन्याय किये हैं और यह जगजाहिर है की यह अन्याय हमारी जन्मदात्री स्त्री वर्ग के साथ ही हुए हैं किन्तु इस की प्रतिक्रिया स्वरुप नारी विमर्श और स्वातंत्र्य को मात्र दैहिक एवं भौतिक स्वातंत्र्य तक सीमित करना तार्किक है और वो भी सहअस्तित्व के सिद्धान्त के खिलाफत की हद तक जाकर ।…।।

यदि इस वीडियो में कही बात को सामजिक स्वीकृति मिल भी जाए तो क्या समाज सही मायने में शेष भी रहेगा , मुझे संदेह है ! एक ओर मैं फिर कह रहा हूँ की पुरुष वर्ग द्वारा आज भी महिलाओं को समकक्ष मानने के उदहारण अपवाद मात्र ही मिलेंगे जो की निहायत ग़लत और पूर्वाग्रह पूर्ण है किन्तु दूसरी ओर यदि महिलाओं द्वारा पारिवारिक बंधनों को लांघना और अपने विपरीतलिंगी से उसी बंधन में बंधे रहने की अपेक्षा करते रहना , स्वयं लंबे संबंधो के बाद भी शादी से इनकार करने को अपने विकल्प के रूप में देखना और वहीं अपने पुरुषमित्र के ऐसे ही किसी व्यवहार को बलात्कार जैसे जघन्य और पाश्विक अपराध के रूप में प्रस्तुत करना ही नारी सशक्तिकरण के असली मायने हैं तो मैं भयभीत हूँ । सहअस्तित्व में स्वातंत्र्य से कहीं ज्यादा आवश्यक सामंजस्य होता है , ऐसा मेरा मनना है ।

लेकिन अभी प्रायश्चित करने और अपने द्वारा (पुरुष वर्ग) किये गए और किये जा रहे स्तरहीन व्यवहार के लिए क्षमा मांगने का दायित्व दूसरे पक्ष की आलोचना करने से ज्यादा समीचीन है ।। क्षमा अगर अभिव्यक्ति में भटकाव आया हो //बाई द वे इट्स माय च्वॉइस //
…………………………..शिवम् मिश्र

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Follow by Email
Facebook
Facebook
YouTube
YouTube
LinkedIn