आँख के आंसू बह न सके जब,
तो हम कैसे प्यार करें।
ग़म के तूफां सह न सके जब,
तो हम कैसे प्यार करें।।
इश्क़ नहीं है इतना आसां,
की जब चाहा इश्क़ किया।
दिल की अपने कह न सके जब,
तो हम कैसे प्यार करे।।

उनकी पाक़ रूहानी शीरत,
सहज सरल सौंदर्य की मूरत।
तम को दूर करें जो किरणें,
उन किरणों सी उनकी सूरत।।
उनकी भला बखान करूँ क्या ,
मन निर्मल जैसे गंगा जल।
बातें उनकी भगवत गीता,
कहने की कुछ नहीं जरुरत।।

उनके संग गर रह न सके जब,
तो हम कैसे प्यार करें।
गैर को अपना कह न सके जब,
तो हम कैसे प्यार करें।।
पर पीड़ा महसूस करे जो,
वो ही सच्चा स्नेही है।
भावों में उनके बह न सके जब,
तो हम कैसे प्यार करें।।

… जारी ……….
Posted by शिवम मिश्र

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