बहुत सोचा , बहुत समझा ,
मैं लेकिन सह नहीं पाया !
बिना देखे उसे , इक दिन ,
मगर मैं रह नहीं पाया !!
दिखाए ख्वाब उसने ,
जश्ने – ज़न्नत के , मुझे लेकिन !
हक़ीकत मैं उन्हें फिर भी ,
 कभी भी कर नहीं पाया !!
पहेली बनके रह गयी है ,
 देखो… ज़िन्दगी मेरी !
कि क़िस्मत ने दगा इक बार ,
 फिर मुझसे है फरमाया !!
वे कहते हैं मुसीबत , यूँ ही ,
 टल जाएगी.. ऐ मेरे दोस्त !
मुझे भी है यकीं , क्यूंकि ,
साथ मेरे , मेरे अपनों का है साया !!
ज़माने से नहीं सिकवा ,
शिकायत है न गैरों से !
ख़ुद ही को कोसता हूँ ,
दिल की मैं अपने , सुन नहीं पाया !!
अभी भी इल्म है मुझको ,
 कि मंजिल है मेरी मुमकिन !
दुखों के बादलों संग मैं ,
 अभी भी बह नहीं पाया !!
यकीं है ख़ुद को कि ,
इकदिन सितारा मेरा चमकेगा !
शख्सियत की बुलंदी का ख़जाना ,

मेरे फिर , काम है आया !!

6 thoughts to “यकीं है ख़ुद को कि …

  • वन्दना

    बेहद उम्दा भावाव्यक्ति।

    Reply
  • Sunil Kumar

    रचना अच्छी लगी बधाई हो….

    Reply
  • pushker

    good,,,,,mere apne dil ka fasana mujhe mil gaya ,,,,akhir dukh kuchh to kam hua,,,,

    Reply
  • दिगम्बर नासवा

    मंज़िल ज़रूर मिलेगी … हिम्मत रखनी हूगी ….

    Reply
  • S.N SHUKLA

    बहुत खूबसूरत प्रस्तुति , सुन्दर भावाभिव्यक्ति , आभार

    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारें

    Reply
  • Gunjan Kumar

    Heart touching sir,,,,,,,,

    Thank you very much.

    Reply

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