सहनशील , सृजनशील…
..संघर्षशील नारी की ,
 दुःख भरी दास्ताँ !
हो कोई भी रूप ,
सिर्फ धूप ही धूप !
हैं सभी अपने ….
पर नहीं किसी को वास्ता !
नारी की दुःख भरी दास्ताँ !!
कभी परिवार के लिए, 
कभी समाज के लिए !
कभी कल के लिए… 
..तो कभी आज के लिए ! 
करती आयी है त्याग ,
सहती आयी है आग !
चलती है , रुकती है ,
बदल देती है रास्ता !
हैं सभी अपने …. 
पर नहीं किसी को वास्ता !
नारी की दुःख भरी दास्ताँ !!
कभी पिता की आन के लिए ,
कभी पति की शान के लिए !
कभी बेटे की जान के लिए …
..तो कभी बेटी के मान के लिए !
देती आयी है बलिदान ,
सहती आयी है अपमान !
रोती है , घुटती है ,
समय भी, उसे है फांसता !
हैं सभी अपने ….
पर नहीं किसी को वास्ता !
नारी की दुःख भरी दास्ताँ !!

3 thoughts to “हैं सभी अपने …

  • Sunil Kumar

    बहुत संवेदनशील रचना , अच्छा सन्देश दे रही है, बधाई …..

    Reply
  • shashi

    excellent!!

    Reply
  • Ruchi

    Heart touching thought. Wonderful Work !

    Reply

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