देखा मैंने आज जिसे ,

कहते माटी का लाल उसे  !!
मानवता की रक्षा करता ,
ह्रदय हर्ष देकर दुःख हरता!
निर्मल निश्छल निः स्वार्थ भाव से ,
जन जन की है सेवा करता !
कृषि कर्म में रत रहता ,
ना आती कोई चाल उसे !
सरल सहज जीवन जीता ,
कहते माटी का लाल उसे !!
गुज़र बसर करने की खातिर ,
वह लाखों कष्ट उठाता  है !
वो भरता पेट सभी का ,
और खुद भूखा सो जाता है !
बेटी का ब्याह न करने का ,
है रहता सदा मलाल उसे !
सर झुक जाने का भय रहता ,
कहते माटी का लाल उसे !!
सहज सभी संघर्ष सहन की,
छमता कहाँ  से आती है ?
जाँबाज किसान की व्यथा देख ,
यह धरती भी सकुचाती है !
मर जाने को उकसाता है ,
नित-नित बढ़ता ऋण जाल उसे !
नत-मस्तक होता मैं जिस पर ,
कहते माटी का लाल उसे !!

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